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  • राष्ट्रीय स्वायत्ता शिक्षा आयोग प्रारूप

    Posted on December 21st, 2009 Bharatiya Shiksha No comments

    राष्ट्रीय स्वायत्ता शिक्षा आयोग प्रारूप

    शिक्षा में स्वायत्ता का सिद्वांत मात्र भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इस सिद्वांत को स्वीकार किया गया है, जब भारत में शिक्षा विश्व के श्रेष्ठतम स्तर पर थी तब भी शिक्षा राजनीति की चेरी कभी नहीं थी।

    शिक्षा के सिद्वांत, व्यवहार, नीति निर्धारण सभी का केन्द्र बिन्दू स्वायत्ता हैं इस हेतु शिक्षा, शासन, प्रशासन एवं राजनीति से पूर्णरूप से मुक्त हो।

    स्वायत्ताता है तभी शिक्षा का वास्तविक स्वरूप बन सकता है। अंग्रेजो के भारत छोड़ने के बाद इसका चिंतन अधिक शुरू हुआ। क्योकि स्वतंत्रता प्राप्त होने के कारण अंग्रेजो के शिंकजे से शिक्षा मुक्त हो गई लेकिन आगे शिक्षा फिर से राजनीति की चुंगल में न फंसे इस विचार को देश के शिक्षाविद् भी आवश्यक मानते थे एवं उनका कहना था कि इस विषय को गंभीरता से सोचना चाहिए।

    कोठारी कमीशन के अनुसार स्वायत्ताता हेतु आवश्यक है

    • विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागो, महाविद्यालयों एवं शिक्षको तथा छात्रों को स्वायत्ताा मिलनी चाहिए।
    • विश्वविद्यालय को प्रशासन एवं आर्थिक संस्थानों से स्वायत्ताता मिलनी चाहिए।
    • राजनीति एवं बाजार के दवाब से भी शिक्षा मुक्त होनी चाहिए।
    • सरकार द्वारा आवश्यक आर्थिक सहयोग अवश्य हो (कुछ लोगो का मानना है इसके कारण भी विश्वविद्यालय पर सरकार का दवाब रहता है) ओडिट सरकार के द्वारा न होकर समाज के द्वारा हो। इस हेतु सरकार नियम भी इस दृष्टिकोण से बनाये।

    विश्वविद्यालय की स्वायत्ताता के साथ-2 जवाबदेही भी सुनिश्चित हो एवं कार्य प्रणाली में पारदर्शिता भी रहे जिससे उनकी स्वायत्ताता बनी रहें एवं सही दिशा में विकास हो तथा विश्वविद्यालय शैक्षिक ऊचाईयाँ को प्राप्त कर सके।

    राधाकृष्णन आयोग की स्वायत्ताता के संदर्भ में अनुशंसाए :

    • बहिर के दवाब रहते हुए वास्तविक स्वायत्ता लुप्त हो गई है।
    • जनभावना का आदर रखते हुए विश्वविद्यालय को कार्य करना चाहिए लेकिन उनके दवाब तले कार्य करने से विश्वविद्यालय स्वंय भ्रष्ट हो सकते हैं।
    • शिक्षा समवर्ती सूची में होनी चाहिए लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय का एक निश्चित स्तर बना रहे इसकी ओर केन्द्र सरकार को भी देखना चाहिए।
    • संभावना के अनुसार उतम संविधान बने एवं इसमें सही में विद्वान लोग हो तथा इसके बाद उनको स्वायत्ता बनाकर सरकार ने हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
    • वास्तविक रूप में शिक्षा हेतु शोध कार्य एवं शिक्षा के स्तर को बढ़ाने में लगे हुए ऐसे शिक्षक एवं छात्रो का विश्वविद्यालय के संचालन में सहभाग होना चाहिए।
    • नियम ऐसे हो जो विश्वविद्यालय के वास्तविक दृष्टिकोण के विरूध्द न हों अगर ऐसा है तो उनको दूर करना चाहिए।
    • निश्चित ढांचा बनकार उसमें विश्वविद्यालय को फिट नहीं करना चाहिए।
    • शिक्षाविदों का एक समाज बने जो विश्वविद्यालय का संचालन करे।
    • छात्रों एवं शिक्षकों को अधिक से अधिक सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। इसमें उसका वरिष्ठ अधिकारी विरोध करे तब भी यह करना चाहिए।
    • विश्वविद्यालय में सभी के प्रति समान दृष्टिकोण होना चाहिए जिससे वास्तविक स्वायत्ताता आयेगी।

    इस प्रकार देश की शिक्षा राष्ट्रीय एवं समाज की आवश्यकता के अनुरूप तथा

    छात्रों के समग्र विकास कर सके इस हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्वायत्ता शिक्षा आयोग बने यह अनिवार्य है तथा भारतीय शिक्षा सेवा की भी रचना हो।

    स्वायत्ताता की संकल्पना

    स्वायत्ताता यह कोई अलग ढांचा नहीं है। राष्ट्र एवं समाज की धड़कन के अनुरूप होता है। हमारे समाज की धड़कन है विविधता में एकता, एकात्म (समग्रता में) विचार, आध्यात्मिकता, सर्वे खल्विदं ब्रह्म ( ।सस मंबी द्वम) मानवता, सहिष्णुता, सामाजिक समरसता, पारिवारिक दृष्टि व्यक्ति स्वतंत्र एवं सामाजिक अनुशासन में तादात्मय इन सिद्वांतो को कायम रखते हुए समय की आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तनशील रचना बने।

    स्वायत्ता शिक्षा आयोग के हेतु :-

    • शिक्षा का समग्रता से चिंतन हो।

    शिक्षा अखण्ड मण्डलाकार है, टुकड़ो-टुकड़ो में शिक्षा का विचार खण्डित तथा असंतुलित व्यक्तिव का सृजन करेगा।

    • मातृशिक्षा से उच्चतम शिक्षा तक एकात्म तत्व परिलक्षित होना चाहिए।
    • प्राचीन ज्ञान का आधुनिकरण तथा आधुनिक ज्ञान का राष्ट्रीयकरण करना।
    • ज्ञानवान, भावनायुक्त तथा आध्यात्मिक समाज के निर्माण हेतु कार्य करे।
    • पाठयचर्या, पाठयक्रम एवं पाठयपुस्तकों की रचना देश की संस्कृति के अनुरूप, व्यक्ति के समग्र विकास एवं देश-समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु हो।
    • शिक्षा का व्यक्ति निर्माण उदेश्य है। इस दृष्टि से शिक्षार्थी शारीरिक दृष्टि से सबल, प्राणिक दृष्टि से संतुलित, बौद्विक दृष्टि सत्यानवेशी, मानसिक दृष्टि ेस सद्विचारी तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सेवा भावी होना चाहिए।
    • इस हेतु पाठयक्रम की रचना में कुछ प्रतिशत विषय वसतु देशभर में समान हों तथा कुछ राज्यों एवं क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप हों।
    • स्वामी दयानंद, विवेकानंद, महर्षि अरविंद, भगिनी निवेदिता, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, डा. राधाकृष्णन इन शिक्षा मनीषियों ने शिक्षा सम्बन्धी जो सूत्र दिए है। उनको आधार बनाकर आधुनिक संदर्भ में शिक्षा के भव्य स्वरूप को विकसित करना होगा।

    रचना

    • आयोग उपरोक्त हेतु की पूर्ति कर सके, इसके लिए ख्याति प्राप्त शिक्षाविदों को मनोनीति किया जाए।
    • विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभावान विद्वानों को इसमें सम्मिलत किया जाए।
    • शिक्षाविदों के साथ-साथ शिक्षक, छात्र प्रतिनिधि तथा शिक्षा के विभिनन संस्थानों के अध्यक्ष, निदेशक सदस्य हो सकते हैं
    • आयोग का गठन संसद के कानून के तहत हो।
    • इस आयोग का स्तर न्यायालय या चुनाव आयोग जैसा हो।
    • आयोग का कार्यकाल कम से कम पांच वर्ष का हो।
    • इसके अध्यक्ष का चयन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त खोज समिति के द्वारा हो इस हेतु राष्ट्रपति केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रमुख विपक्षी दल के साथ भी विचार-विमर्श करें।
    • एक प्रतिनिधि सभा 51 या 101 सदस्यी हो तथा कोर गुप्र के रूप में कार्यकारिणी का गठन हो।
    • राष्ट्रीय, प्रांतीय एवं जिला स्तर पर संस्थान का गठन हो।

    F संस्थान के कार्य

    • संस्थान का प्रमुख कार्य नियामक, निरिक्षण, निर्देशन, क्रियान्वयन एवं शिक्षा का समग्र चिन्तन हो।
    • शिक्षा की प्रमुख समस्याओं का अध्ययन करके शैक्षिक संस्थानों को क्रियान्वयन हेतु सुझाव देना।
    • शिक्षक प्रशिक्षण, पाठयचर्या, शिक्षा देने की पध्दति, परीक्षा पध्दति, प्रवेश प्रक्रिया, छात्रों का मूल्यांकन एवं शिक्षा में गुणात्मकता आदि बातों का समय-समय पर निरीक्षण, मूल्याकन एवं नवीनीकरण हेतु कार्य हो।
    • विश्वविद्यालय के कुलपति, राज्य स्तर के आयोग के अध्यक्ष एवं विभिन्न संस्थानों के उच्च प्रदस्थ अधिकारियों का चुनाव  नामित करना।
    • अन्य देशों की शिक्षा पध्दति का अध्ययन वहां के शैक्षिक संस्थानों के साथ शिक्षा के संदर्भ में आदान-प्रदान एवं संयुक्त आयोजन की योजना बनाना।
    • यह संस्थान सरकार, निजी, अनुदान प्राप्त संस्थाएँ एवं विदेशी संस्थाएँ इन सभी पर निगरानी रखने का कार्य समानरूप से करेगा।
    • सभी प्रकार के शैक्षिक संस्थानों में लोकतांत्रिका व्यवस्था की प्रकिया ठीक चले, इसकी निगरानी रखना।

    संस्थान की कार्यप्रणाली

    • योजना एक तरफा नहीं लेकिन ऊपर से नीचे एवं नीचे से ऊपर होनी चाहिए।
    • पारदर्शिता एवं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था बने।
    • अन्याय निवारण हेतु सभी स्तर पर व्यवस्था हो (ग्रीवन्स सेल)
    • स्थानीय एवं जिला स्तर पर सारे अधिकार दिए जाए।

    (अतुल कोठारी)

    राष्ट्रीय सह-संयोजक

    शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति

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