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राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रतिवेदन में व्यवसायिक शिक्षा
Posted on December 21st, 2009 No commentsराष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रतिवेदन में व्यवसायिक शिक्षा
अतुल कोठारी
सह-सचिव,शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास
ईमेल : atulabvp@rediffmail.com,
मो:9212385844,
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने व्यवसायिक शिक्षा को दो हिस्सों में बांटकर सुझाव दिए हैं। एक व्यवसायिक शिक्षा (वोकेशनल एजुकेशन) दूसरी पेशेवर शिक्षा (प्रोफेशनल एजुकेशन) विद्यालयी स्तर पर व्यवसायिक शिक्षा तथा पेशेवर शिक्षा में मैडिकल कानूनी तथा प्रबंध शिक्षा का तुलना में अधिक विचार किया है साथ ही इंजीनियर एवं फार्मेसी शिक्षा के बारे में भी नाम मात्र के सुझाव दिए हैं।
v व्यवसायिक शिक्षा (वोकेशनल एजुकेशन)
व्यवसायिक शिक्षा को पूरी तरह मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अर्तगत लाने का अच्छा सुझाव है क्योकि वर्तमान में आई.टी.आई जैसी संस्थाएं श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अर्तगत हैं। वास्तव में तो शिक्षा के सारे पाठयक्रम एक ही मंत्रालय के अंतर्गत होना चाहिए तथा वह मंत्रालय का नाम भी मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बदले शिक्षा मंत्रालय ही होना चाहिए। ज्ञान आयोग ने इस शिक्षा की योजना हेतु राष्ट्रीय व्यवसायिक शिक्षा नियोजन एवं विकास संस्थान तथा इसके प्रशिक्षण हेतु स्वतंत्र विनिमयन एजेन्सी की आवश्यकता पर बल दिया है।
आयोग ने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा है कि देश में मानवशक्ति का विस्तृत अध्ययन होना चाहिए एवं उसके आधार पर 11वी पंचवर्षीय योजना के व्यय की मात्रा तय करनी चाहिए। व्यय के संदर्भ में यह भी कहा है कि शिक्षा के कुल व्यय में से 10 से 15 प्रतिशत व्यय व्यवसायिक शिक्षा पर होना चाहिए। आगे शिक्षा के सभी आयामो के लिए दिए सुझाव जैसे छात्रो के शुल्क बढ़ाने है। उद्योग, व्यापार क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने हेतु तथा बाजार की आवश्यकताओं को भी ध्यान देने के भी सुझाव दिए है।
व्यवसायिक शिक्षा को माध्यमिक शिक्षा जितना ही महत्वपूर्ण माना जाए तथा व्यवसायिक शिक्षा के बदले कौशल विकास शब्द के उपयोग का भी सुझाव है।
v कानूनी शिक्षा
ज्ञान आयोग ने कानूनी शिक्षा को पेशेवर शिक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक माना है। कानूनी शिक्षा की बदतर स्थिति के लिए बार काउन्सील आफ इंडिया को जिम्मेदार मानते हुए कहा है कि धरेलु एवं अर्न्तराष्ट्रीय चुनौतियों का सामने करते हेतु न उनके पास कोई अधिकार है न विशेषता है इसलिए एक नये विनियामक तंत्र स्थापन की वकालत की है। इसी प्रकार कानूनी शिक्षा देने वाले संस्थानो के मुल्याकन हेतु स्वतंत्र क्रम निर्धारण प्रणाली (Independent System) के गठन का सुझाव भी दिया हैं। कानून के पाठयक्रम एवं पाठयचर्या निर्धारण हेतु आयोग ने राष्ट्रीय विधि स्कुल के गठन की बात कही है, साथ ही एक मॉडल पाठयक्रम बनाकर कानूनी शिक्षा को सामाजिक दृष्टि से प्रवृत करते हुए छात्रो को सामाजिक न्याय के प्रति संवदेनशील बनाने की बात कही है। इस हेतु छात्रो से फीडबेक लेने का भी सुझाव दिया है। परीक्षा में सुधार हेतु सुझाव देते हुए वर्तमान की व्यवस्था में सुधार करते हुए परीक्षा में सैध्दांतिक एवं समयोन्मुखी दृष्टिकोण लागू करने हेतु वकालत की है। कानूनी शिक्षा में अनुसंधान को बढ़ावा देने हेतु विधिक अध्ययन एवं अनुसंधान केन्द्र की स्थापना का सुझाव भी दिया है साथ ही विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयो के साथ भागीदारी तथा संयुक्त/दोहरी डिग्रीयाँ देने की बात भी कही है।
v चिकित्सा शिक्षा
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने चिकित्सा शिक्षा में सुधार हेतु कुछ अच्छे सुझाव दिए है। स्वतंत्रता के 60 वर्ष बाद गांवो तक चिकित्सा उपलब्ध नहीं हो पा रही इसको स्वीकार करते हुए ग्रामीण चिकित्सा कार्यक्रम चलाया जाए तथा ग्रामीण चिकित्सकों को वर्तमान मेड़िकल कॉलेजो में ही प्रशिक्षण देने हेतु सुझाव दिया है। सभी निजि चिकित्सा महाविद्यालयो को अपनी विवरणीका में शुल्क की घोषणा करनी चाहिए तथा प्रवेश हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक सामान्य प्रवेश परिक्षा का भी सुझाव दिया है। इस प्रकार के महाविद्यालयों के क्षेत्रीय संतुलन हेतु केन्द्र सरकार प्रयास करे तथा प्रत्येक राज्य में एक संस्थान उत्कृष्टता का केन्द्र बनाना चाहिए यह भी कहा है।
इसके साथ ही स्वतंत्र एवं मानकीकृत (Standared) अंतिम परिक्षा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन करने हेतु सुझाव इतने विशाल देश में व्यवाहारिक दृष्टि से कैसे होगा यह प्रश्न उठता है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यवसायी को 4 वर्ष के बाद पुन: प्रमाणन ( Recertification Process) प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य करने का सुझाव भी कितना संभव है यह चिंतन का विषय है।
अनुसंधान को बढ़ावा देने एवं स्नातक के बाद तीन वर्ष गांवो में कार्य करने वाले छात्रो हेतु स्नोतकोत्तार के प्रवेश में 20 प्रतिशत सीटे आरक्षित रखने हेतु अच्छे सुझाव दिए हैं।
मैडिकल, डेन्टल, फार्मेसी काउन्सील मात्र व्यवसाय इच्छुक व्यक्तियों को लाईसेंस देने हेतु देशभर में परीक्षा आयोजन करने का मात्र कार्य करे। चिकित्सा शिक्षा के संचालन हेतु IRAHE के तत्वाधान में एक स्थायी समिति का गठन करने की भी वकालत की है।
v प्रबंधन शिक्षा
वर्ष 2000 के पूर्व देश में 700 प्रबंधन संस्थान थे वे बढ़कर आज 1700 के आसपास हो गए है लेकिन इन संस्थानो में गुणात्मकता से समझौता किया जा रहा है। इन संस्थानो में दुर्भाग्यवश शोषणात्मक एवं वाणिज्यिक वातावरण उभरकर आया है इस कटुसत्य का स्वीकार आयोग ने किया है।
इस शिक्षा हेतु भी स्वायत्ता स्थायी समिति के गठन एवं इसके अंतर्गत प्रबंध शैक्षिक निकाय गठित हो। इस निकाय के द्वारा सामाजिक दृष्टि से सुवधिाविहीन छात्रो हेतु छात्र वृति उपलब्ध कराने हेतु सुझाव दिया है।
इन संस्थानो में योग्य संकाय की अनुपब्लधता को ध्यान में लेते हुए इस हेतु भी स्वायत्ता संस्थान की आवश्यकता ज्ञान आयोग ने जताई है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों के प्रबंध विभाग छोड़कर अन्य सभी संस्थानो को स्वतंत्र दर्जा देने की बात ज्ञान आयोग ने की है।
अध्ययन क्षेत्र के विस्तार एवं इसकी प्राथमिकता बढ़ाने हेतु ओनलाईन प्रबंध शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन, सहकारिता प्रबंधन इत्यादि को बढ़ावा देने का सुझाव भी दिया है।
v अन्य पेशेवर शिक्षा
इंजीनियरिंग शिक्षा बहुत पुरानी एवं अनुपयोगी हो गई है। इसके साथ ही भविष्य की संभावनओं को ध्यान में रखकर उनके विस्तार करने एवं गुणात्मकता को सुधारने का जिक्र किया है।
अर्थचिकित्साकर्मी की भूमिका का विस्तार हो उनके लिए उच्च माध्यमिक शिक्षा में व्यवसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए तथा अर्धचिकित्सकीय परिषद् की स्थापना करने का सुझाव भी दिया है।
फार्मेसी शिक्षा में सीटो की भारी वृध्दि करने का सुझाव भी दिया है।
v उपसंहार
स्वतंत्र भारत में व्यवसायिक एवं पेशेवर शिक्षा की विफलता को स्वीकार किया है। पुरानी व्यवस्था यानी जैसे ए.आई.सी.ई.ई बार काउन्सिल, मेडिकल काउन्सिल आदि… के अधिकारो में कटौती करते हुए विभिन्न प्रकार के नये-2 संस्थानो के गठन करने के सुझाव दिए है साथ ही गुणत्मकता एवं अनुसंधान को बढ़ावा देने का जिक्र भी है। अनेक स्थानो पर बाजार की जरूरतों के अनुसार विचार करने हेतु सुझाव दिया है। क्या, व्यवसायिक या पेशेवर शिक्षा सिर्फ बाजार हेतु है? यह प्रश्न उठता है। विदेशी विश्वविद्यालय के साथ भागीदारी का जिक्र किया है लेकिन वर्तमान में देश में इस हेतु कानूनी व्यवस्था का संदतर अभाव है। इसके बिना यह कैसे संभव होगा यह भी सोच का विषय है। इस प्रकार के अनेक सुझावो की व्यवहारिकता पर प्रश्न खड़े होते है एवं बहुत सारे सुझावो का आवश्यक विस्तृत विवरण भी वृत्ता में नहीं दिखाई दे रहा है।
v सुझाव
वास्तव में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने ऊपर-2 से इधर-उधर से इकठ्ठा करके कुछ सुझाव लिख दिए हैं। व्यवसायिक शिक्षा, संस्थानो की गुणवत्ताा, व्यापारीकरण, व्यवस्था की वास्तविक स्थिति, संस्थानों के भौगोलिक असंतुलन इत्यादि विषयों के संदर्भ में गहरे चिंतन, वास्तविक स्थिति एवं उसके सुधार हेतु ठोस योजना प्रस्तुत करनी चाहिए थी।
वर्ष 2006 के आकंड़ो के अनुसार देश में कुल 1346 इंजीनियरिंग महाविद्यालय में से 922 महाविद्यालय केरल, कर्णाटक, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र मे थे। इन प्रांतों में छोटे केन्द्रो पर खुले इन महाविद्यालयों में सीटों की उपलब्धता से काफी कम संख्या में छात्र प्रवेश ले रहे है। इन कारणो से महाविद्यालयों में अक्षम छात्रो को भी पास कर दिया जाता है। (निजीकरण से गुणात्मकता बढ़ेगी इसकी वकालत कुछ लोग करते है)
गुणात्मकता की दृष्टि से NASSCOM के सर्वे के अनुसार भारत के 20 प्रतिशत इंजीनियंरिंग के संस्थान अंर्तराष्ट्रीय स्तर के 20 प्रतिशत काम चलाऊ तथा 60 प्रतिशत द्वितीय दर्जे के हैं। इनमे ये बहुत सारे संस्थान शिक्षकों की कमी से जूझ रहे है। क्वालीफाईड फैकल्टी का अभाव है, नाम मात्र के पी.एच.डी किए हुए फैक्लटी है। संसाधन एवं व्यवस्थाओं की दृष्टि से अनेकों संस्थानों की स्थिति दयनीय है। देश मे शायद ही किसी महाविद्यालय में वास्तविक प्रैक्टीकल होता होगा।
व्यवसायिक महाविद्यालयों में बड़े प्रमाण में अल्पसंख्यक संस्थान खुले हुए हैं। केरल में संख्या की दृष्टि से देखें तो हिन्दु संस्थान अल्प संख्या में हैं। 150 इंजीनियरींग महाविद्यालय में से 110 अल्पसंख्यक संस्थान हैं। व्यवसायिक संस्थानों में व्यापारीकरण ने भी भयानक रूप ले लिया है। वर्ष 2006-07 में 9 छात्रो ने इसी वजह से आत्महत्याएँ की है। यु.आर.राव (पूर्व अध्यक्ष, इसरो) कमेटी (2003) के अनुसार इंजीनियर में एक छात्र का खर्च 20 से 22 हजार होता है लेकिन देश में आंध्र प्रदेश जैसे प्रांत में 22 से 25 हजार शुल्क है जब की राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्ताराचंल इत्यादि प्रांतो में 60 से 70 हजार तक शुल्क लिया जा रहा है।
व्यवसायिक पाठयक्रमों का मूल्य शिक्षा से तो दूर-दूर का कोई संबध नहीं दिखाई देता। देश की आवश्यकताओं के अनुरूप भी पाठयक्रम का विचार नहीं किया जा रहा है। प्रबंधन के अनेको संस्थानों ने विदेशी विश्वविश्वविद्यालय से संबद्वता लेते हुए पूर्णरूप से उन्हीं का पाठयक्रम लागु किया है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने व्यवसायिक शिक्षा के सम्बन्ध में विचार करते समय आई.टी शिक्षा के बारे मे सोचना आवश्यक नहीं समझा। विगत कुछ वर्षो में इनफोरमेशन ट्रेकनोलोजी (आई.टी) के कारण भारत का नाम विश्व में आगे बढ़ा है। हमारे 2.5 लाख से अधिक इंजीनियर है। लेकिन इतने से संतोष मानने से हमकों विपरित परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं क्याेंकि हमारा मुख्य आधार अमेरिका है 70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत खरीदारी उनकी है। हम सोफटवेयर में तो आगे है लेकिन हार्डवेयर में काफी पीछे है। हमारे देश की आवश्यकता के अनुसार आई.टी. के विकास की सोच नहीं है आज भी हमारे स्थानीय बाजार में आर.बी.एम. ओरेकल जैसी कम्पनियाँ ज्यादा प्रभावी हैं।
इस प्रकार के अनेकों विषयों पर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने विस्तृत विचार करने की आवश्यकता थी। लेकिन अनुभव यह आ रहा है कि इस प्रकार के चिंतन हेतु ज्ञान आयोग में न लोग है न इस प्रकार के विचार, सुझाव देने वालो की उनको कोई जरूरत है।
क्योकि 2 वर्ष पूर्व शिक्षा क्षेत्र में भी बहुत कम लोग राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के नाम से परिचित थे लेकिन अ.भा.वि.प., भारतीय शिक्षा मंडल, विद्या भारती, रा. शै. महासंघ, शिक्षा बचाओ आन्दोलन के माध्यम से देशभर में बड़ी मात्रा में परिसंवाद, संगोष्ठियो का आयोजन करके वास्तविक रूप में ज्ञान आयोग को प्रचारित करने का कार्य किया एवं महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए लेकिन ज्ञान आयोग ने अभी तक इस प्रकार के किसी भी संगठन के साथ संवाद करने का प्रयास करना तो दूर की बात रही लेकिन इन संगठनो के द्वारा मिलने के औपचारिक प्रयास का भी कोई सकारात्मक उत्तार नहीं दिया है।
दूसरी ओर इन सारे सुझावों में बहुत कम लोगों की सहभागिता हैं विशेषकर के छात्रो की भागीदारी बिल्कुल नजर नहीं आती। जिन लोगो की सहभागिता है वह भी एक विशेष विचार के लोग अधिक दिखाई दे रहे हैं एवे देश के शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संगठन एवं संस्थाओं को योजनापूर्वक दूर रखने का दूर्भाग्यपूर्ण प्रयास स्पष्ट दिखाई दे रहा है। 1967 में जब नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास हुआ तब भी केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन उस समय सभी प्रकार की विचारधारा की संस्थाए, संगठनों को आमंत्रित किया गया था। सुझाव भी लिये गये थे लेकिन प्रश्न उठता है कि राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष अमेरिका में बैठे-बैठे कुछ गिने चुने लोगो के सुझाव लेकर देश को ज्ञान देना चाहते है क्या? वास्तव में अभी तक आये दो रिपोर्ट में देश के शिक्षाविद ज्ञान ढूढ़ने का प्रयास कर रहे है। लेकिन अभी तक सफलता प्राप्त नहीं हुई है।
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