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  • शैक्षिक परिवर्तन : आगामी दिशा एवं योजना

    Posted on December 22nd, 2009 Bharatiya Shiksha No comments

    शैक्षिक परिवर्तन : आगामी दिशा एवं योजना

    (शिक्षा बचाओ आंदोलन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का संयुक्त प्रयास)

    अतुल कोठारी] राष्ट्रीय सहसंयोजक

    शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति

    सह-सचिव,शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

    फोन: 9212385844, Email : atulabvp@rediffmail.com

    शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति की शुरूआत 2 जुलाई 2004 को हुई। अपने चार वर्षों के अल्पकाल में इसने राष्ट्रीय स्तर पर एक सजग एवं प्रभावी आंदोलन के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। आने वाले वर्षों में यह पूरे देश में शिक्षा परिवर्तन के लिए एक सशक्त माधयम बनकर उभरे – ऐसी अपेक्षा अनेक शिक्षाविद्, शिक्षक, छात्र, अभिभावक एवं आमजन के मन में है।

    शुरूआत के दिनों से शिक्षा बचाओ आन्दोलन ने पाठयक्रम सम्बन्धित विकृतियों को उठाया, उनपर विभिन्न उपलब्ध माधयमों से संघर्ष किया तथा सफलताएँ प्राप्त की। एन.सी.ई.आर.टी. की इतिहास की पुस्तकों में तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए गये तथ्यों एवं आपत्तिजनक अंशो को चिन्हित कर उनपर देशभर में आंदोलन चलाया गया तथा न्यायालय में जीत प्राप्त कि। ठीक इसी प्रकार इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय (इग्नू) के पाठयपुस्तकों में हिन्दू देवी-देवताओं पर लिखे अति आपत्तिजनक अंशो पर संघर्ष कर सरकार को उन्हें वापस लेने पर बाध्य किया गया। मानव संसाधन विकास मंत्री को आठ दिनों के अंदर संसद में इस सम्बन्ध में घोषणा करनी पड़ी। केन्द्र सरकार द्वारा यौन शिक्षा को विकृत रूप में लागू करने के प्रयास पर देश भर में जनजागरण एवं आन्दोलन चलाया गया फलत: ग्यारह राज्यों की सरकारों ने यौन शिक्षा को इस रूप में लागू करने से स्पष्ट मना कर दिया। केन्द्र सरकार भी इस पर पुनर्विचार करने को मजबूर हुई। राष्ट्रीय खुला विद्यालय के पाठ्यक्रमों में देश के क्रांतिकारियों को आतंकवादी कहने पर आपत्ति दर्ज की गई। उड़ीसा की पाठ्य पुस्तकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, भाजपा को सांप्रदायिक संगठन कहने पर आंदोलन किया गया जिससे राज्य सरकार ने इस पर कार्रवाई की।

    शिक्षा बचाओ आंदोलन ने शिक्षा क्षेत्र में लोकतांत्रिक माध्यम से उचित परिवर्तन के लिए प्रयास किये है। विभिन्न शैक्षिक विषयों पर आंदोलन कर जन जागरण करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक हिस्सा है जिसे हमने अपनाया। अनेक विषयों पर  देश के कानून के अंतर्गत न्यायालय में प्रयास किये गये हैं जिसका जिला से लेकर उच्चतम न्यायालय में अनुकूल परिणाम भी आये है। अपने देश के लोकतांत्रिक संस्थानों का उपयोग करते हुए अनेक ज्वलंत विषयों पर भी हमारी पहल पर संसद एवं विधान सभाओं में प्रश्न उठाये गये तथा चर्चाएँ भी हुई है।

    हमारा लक्ष्य विभिन्न विषयों पर धरना, जुलूस, प्रदर्शन एवं नारेबाजी करना ही नहीं है हालाँकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अर्न्तगत विभिन्न विषयों पर जनजागरण एवं उचित कार्रवाई हेतु हम इन माध्यमों का सहारा लेते हैं। कई बार परिस्थितियाँ हमें बाध्य करती हैं। राष्ट्रीय खुला विद्यालय के पाठ्य पुस्तकों में देश के क्रांतिकारियों के आतंकवादी कहने पर हमने अधिकारियों से मिलकर अपनी आपत्तियाँ दर्ज की।
    अधिकारियों ने उचित कारवाई की तब हमने इस विषय के प्रचार का भी मोह नहीं किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्राचार पाठ्यक्रम में इतिहास के पुस्तक के संबंध में हमने ज्ञापन एवं कानूनी नोटिस देकर दो महीने का समय दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस दिशा में उचित कदम उठाते हुए आवश्यक सुधार किया फलत: हमने किसी भी प्रकार का आंदोलन नहीं किया। लेकिन कभी-2 इससे उलट अनुभव भी आता है जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास की पुस्तक जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित किया गया है एवं समाज विज्ञान की पुस्तक में वेदों के गलत उदाहरण देकर महिलाओं को अपमानित करने वाली सामग्री परोसी गई है। इस विषय पर बाध्य होकर हमें आंदोलन करना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय के उचित निर्देश के बाद भी दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने इस पुस्तक में परोसी गई विकृत सामग्री को हटाने की घोषणा अभी तक नहीं की है।

    हमारा लक्ष्य प्रचार प्राप्त करना अथवा इसके लिए आंदोलन करना नहीं है। हम शिक्षा में समाज का सहभाग बढ़े इस हेतु समाज में जागृति लाने के लिए प्रयत्नशील हैं। अभी तक विभिन्न विषयों पर देशभर में 700 संगोष्ठियाँ आयोजित की गई हैं जिनमें 1.5 लाख से भी अधिक लोगों का सहभाग हुआ है। यौन शिक्षा के विषय पर राज्य सभा की पीटीशन कमिटी को 41,000 ज्ञापन  तथा पत्र प्राप्त हुए। एक ज्ञापन एक व्यक्ति नहीं देता है इस प्रकार हजारों लोग इस प्रकिया में सम्मिलित हुए। अब तक 45 पुस्तिकाओं का प्रकाशन हो चुका है जो देशभर में 6000 लोगों को भेजी जाती हैं। देश के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न भाषाओं में लाखों पत्रक बाँटे गये तथा विभिन्न विषयों पर हस्ताक्षर अभियान चलाए गये हैं। यौन शिक्षा के विषय पर 4,15,000 हस्ताक्षर प्राप्त किये गये जिसमें जैन समाज का बड़ा योगदान रहा। इसी विषय पर आयोजित सम्मेलन में 26 संस्थाएँ साथ में आई। एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तक जिसमें लिखा था, ‘जाट लुटेरे थे’ पर हरियाणा में पुरा जाट समाज आंदोलित हुआ इसका सकारात्मक परिणाम भी हुआ। एन.सी.ई.आर.टी की पाठयपुस्तक में भगवान महावीर पर आपत्तिजनक टिप्पणी पर जैन समाज के प्रमुख व्यक्ति  के द्वारा अलवर जिला न्यायालय में याचिका दायर की गई जिसमें न्यायालय का निर्णय अपने अनूकुल आया। इसी तरह आर्य समाज एवं स्वामी दयानन्द सरस्वती के विषय में आर्य समाज के कार्यकर्ता द्वारा चण्ड़ीगढ़ उच्च न्यायालय में याचिका दायर कि जिसका भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुआ। शिक्षा बचाओ आंदोलन के कारण विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अनेक बार देश की संसद एवं विभिन्न राज्यों के विधान सभाओं में भी मामले गुँजे।

    हम शिक्षा को  देशहित एवं समाजहित में राष्ट्रीय अवधरणा के अनुरुप ढालना चाहते हैं। देश की जनता का भी मन भी इसी प्रकार से है। परिणामस्वरूप देश में 30 से अधिक शैक्षिक, सामाजिक, धार्मिक, अध्यात्मिक संस्थाएँ एवं विभिन्न राजनैतिक नेतृत्व का इस आन्दोलन को समर्थन प्राप्त हुआ है। केन्द्र एवं राज्य स्तर पर पाठय पुस्तकों में व्याप्त भयानक विकृतियों के कारण भी आंदोलन की आवश्यकता सबने महसूस कि तथा आगे भी इस प्रकार का आंदोलन चलाना पडेग़ा, इस में किसी को संदेह नहीं है। ऐसा भी कहा जा सकता है  कि कुछ मामलों में कार्य प्रतिक्रियात्मक है परन्तु इस माध्यम से व्यापक बहस एवं वाद-विवाद से देश में शिक्षा पर व्यापक  जनजागरण भी हुआ है।

    देश में एक ऐसा वातावरण बन रहा है जिसमें इसकी अत्याधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है कि हमारी”शिक्षा कैसी हो” -समाज इस पर चर्चा करे तथा स्पष्ट मानदण्ड निर्धारित करे। यह कार्य स्वतंत्रता के पश्चात तुरन्त शुरू हो जाना चाहिए था परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया। सरकार ने कोठारी आयोग, मुदलियार आयोग, राधकृष्णन आयोग, 1986 की शिक्षा नीति आदि आयोग बनाऐ जरूर, इनके द्वारा अच्छे सुझाव भी आये परन्तु राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में इनका क्रियान्वयन नही हो पाया।

    शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का गठन शिक्षा क्षेत्र में आमूल चुल परिवर्तन लाने तथा समाज के समक्ष एक नया विकल्प प्रस्तुत करने के लिए किया गया है। इस दृष्टि से निम्नलिखित कार्य आवश्यक लगते है :-

    - शिक्षा के क्षेत्र में देशव्यापी जनजागरण।

    - शिक्षा का हित चाहने वाले शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रत्यक्ष  छात्रा, शिक्षक, शिक्षाविद शिक्षा को संचालित करने वाले विभिन्न संस्थानों के संचालक मंडल, सरकारी
    अधिकारी तथा ऐसे लोगों को इस प्रक्रिया में सम्मिलित कर, सक्रिय एवं    संगठित करके उन सभी के सहयोग से शिक्षा में एक नए विकल्प की तैयारी शुरू करना।

    ये प्रयास विकेन्द्रित एवं देशव्यापी होना आवश्यक है। इस हेतु विभिन्न विश्व विद्यालयों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों द्वारा शिक्षा के पाठ्यक्रम व्यवस्था प्रध्दति एवं नीति आदि के लिए नए मानदण्डों एवं विकल्प तैयार करने का प्रयास करना होगा। साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि केन्द्रीय स्तर पर देश के शिक्षाविदों द्वारा शिक्षा परिवर्तन हेतु कार्य योजना तैयार हो। इस हेतु सेमिनार, संविमर्श, संगोष्ठी, परिचर्चा परिसंवाद आदि आयोजित करना तथा पाठ्य-पुस्तक एवं साहित्य तैयार करने का कार्य हमारी प्राथमिकता होगी। इस प्रयासो के द्वारा तैयार की गई पुस्तकें दिशा निर्देश, देश के सभी प्रकार के शिक्षा संस्थानों जैसे निजी विद्यालय, महाविद्यालय, विश्व विद्यालय तथा विभिन्न सरकारें इसको स्वीकार कर करे – इसके लिए प्रयास करना होगा। इन सभी प्रयासों में देशभर के शिक्षाविद्, शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाले विभिन्न संगठन भारतीय चिंतन के आधार पर प्रत्यक्ष कार्य करने वाली सामाजिक-आध्यात्मिक-धार्मिक संस्थाएँ, शिक्षा का हित चाहने वाले विभिन्न प्रकार के व्यवसायी एवं राजनीतिक नेतृत्व का सहयोग प्रमुख रूप से अनिवार्य है। शिक्षा को देश के अंतिम से प्रथम प्राथमिकता का विषय बनाना होगा।

    इन सारे प्रयासो के माध्यम से देश की शिक्षा की विकृतियाँ एवं गलत बातो को दूर किया जाएगा। देशव्यापी जनजागरण के साथ-साथ देश के परंपरागत ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक संदर्भ में परिभाषित कर देश की शिक्षा की पाश्चात्य प्रभावों से मुक्त कर भारतीय

    संस्कृति के अनुरूप करना होगा। शिक्षा में विकल्प की तैयारी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को पुन: स्थापित करने का कार्य भी अति आवश्यक हैं। पूर्व राष्ट्र प्रमुख डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की 2020 की विकसित भारत की कल्पना या राष्ट्र के पुन निर्माण द्वारा भारत को पुन: विश्व गुरू स्थान पर स्थापित करने का संकल्प शिक्षा के माध्यम से ही भौतिक एवं आध्यात्मिक समृध्दि द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

    (लेखक शिक्षा बचाओ आन्दोलन के राष्ट्रीय सह-संयोजक तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्याय के सह-सचिव हैं)

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