भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

पहल

2 जुलाई 2004 से शिक्षा बचाओ आन्दोलन का सुत्रपात हुआ। इस आन्दोलन के द्वारा देश की शिक्षा में व्याप्त विकृतियों, विसंगतियों के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन चलाया जा रहा है। यह आन्दोलन मात्र छोटी मोटी गलतियों के सुधार तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने देश की भाषा, संस्कृति, धर्म, महापुरुषों, परंपराओं एवं व्यवस्थाओं को अपमानित करने हेतु जो षडयंत्र चलाया जा रहा है, उसे बेनकाब करके रोकने हेतु सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। अभी तक 11 न्यायालयों के निर्णय अपने पक्ष में आए हैं। इस आन्दोलन को संस्थागत स्वरूप देने हेतु वर्ष 2007 में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की स्थापना हुई।

भारत की शालाओं में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों के विकृतिकरण के विरुद्ध अभियान

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् द्वारा प्रकाशित छठीं से बारहवीं तक की इतिहास की पुस्तकों में पढ़ाया जाता था कि –

  • श्री गुरु गोविन्द सिंह मुगलों के दरबार में मनसबदार थे।
  • औरंगजेब जिन्दा पीर थे।
  • लाल, बाल, पाल, वीर सावरकर एवं अरविंद घोष आतंकवादी थे।
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती, इसाइयों के भाड़े के व्यक्ति थे।

इन्दिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को पढ़ाया जा रहा था कि –

  • शिवजी औघड़ तपस्वी थे, श्मशान उनका उपासना स्थल था व तपस्वियों एवं देवताओं की स्त्रियों का शीलभंग किया करते थे।
  • दुर्गा शराब के नशे में धुत रहती थी और उसकी आंखे सदा रक्तरंजित (लाल) रहती थीं। वह तामसिक वृत्तियों की देवी थी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के मुक्त अध्ययन विद्यालय की बी0ए0 द्वितीय वर्ष प्रश्न पत्र 2 की अध्ययन सामग्री में लिखा था –

  • गांधी जी के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का आधार वैज्ञानिक नहीं था। रामराज्य के रूप में स्वराज की उनकी व्याख्या मुसलमानों को उत्साहित नहीं कर सकी।
  • सरदार पटेल ने आर0एस0एस0 का साथ देकर साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में शर्मनाक भूमिका अदा की।

दिल्ली विश्व विद्यालय में समाज शास्त्र की बी0ए0 (पास) भाग 1 की पुस्तक में अंश थे –

  • ऋग्वेद में कहा गया है कि स्त्रियों का स्थान शुद्रों तथा कुत्तों के समान है।
  • स्त्रियां एक वस्तु समझी जाती थी, उन्हें खरीदा तथा बेचा जा सकता है।

आइ0सी0एस0ई0 कक्षा 10वीं का इतिहास एवं नागरिक शास्त्र, खण्ड द्वितीय (हिस्ट्री एण्ड सिविक्स, पार्ट 2) में लिखा गया था।

  • बाल गंगाधर तिलक को “भारतीय अशांति का जनक और अतिवादी पार्टी का प्रभावशाली सदस्य” बताया गया था।
  • लाला लाजपत राय को “महान अतिवादी नेता एवं उग्र राष्ट्रवाद फैलाने वाला” कहा गया है।
  • बिपिन चन्द्र पाल को विख्यात अतिवादी नेता कहा है।
  • इसी प्रकार 50 से अधिक जगह गलत बातें लिखी गई थीं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में बी0ए0 (ऑनर्स) द्वितीय वर्ष की इतिहास की “कल्चर इन एनशिएंट इण्डिया” में विद्यार्थी पढ़ रहे थे –

  • रावण और मन्दोदरी की कोई सन्तान नहीं थी। दोनों ने शिवजी की पूजा की। शिवजी ने उन्हें आम खाने को दिए। गलती से सारे आम रावण ने खा लिए और उसे गर्भ ठहर गया। रावण ने छींक मारी और उससे सीता का जन्म हुआ।
  • हनुमान छुटभैया बन्दर था। वह एक कामुक व्यक्ति था, लंका के शयन कक्षों में स्त्रियों, पुरुषों को आमोद-प्रमोद करते देखता था।
  • रावण और लक्ष्मण ने सीता के साथ व्याभिचार किया।
  • रावण का वध राम के द्वारा नहीं लक्ष्मण के द्वारा हुआ।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की हिन्दी की पुस्तकों में-

  • 100 से अधिक अंग्रेजी के शब्द भी हैं तथा अंग्रेजी की कविता भी है।
  • एम. एफ. हुसैन की आत्म कथा पढ़ाई जा रही है।
  • नक्सलवादी कवि पाश का कविता है।
  • हरामजादा, हरामखोर, बदमाश, भंगी, चमार जैसे आनेक अशिष्ट, असंवैधानिक शब्द पढ़ाए जा रहे हैं।

न्यायालीन हस्तक्षेप एवं पत्रों के माध्यम से एन0सी0ई0आर0टी0 द्वारा इन गलतियों को सुधारा गया है।

‘आरोह’ (कक्षा 11 के लिए हिन्दी आधार की पाठ्यपुस्तक) में पृष्ठ संख्या 126 पर दिए गए पाठ के गृहकार्य में एम0एफ0 हुसैन के देवी देवताओं के विकृत एवं विभत्स चित्रों को वेबसाइट से निकालकर एलबम बनाने को कहा गया था। अपने प्रयासों के कारण सी0बी0एस0ई0 ने इन्हें हटा लिया।

भारतीय ज्ञान परंपरा एवं संस्कृति के विकृत निरूपण के विरुद्ध संघर्ष

अमेरिकन लेखिका वेन्डी डोनिगर द्वारा लिखित ”द हिन्दूज़- एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री” पुस्तक में हिन्दू धर्म का एक अत्यन्त विकृत एवं भ्रामक निरूपण किया गया था। इस पुस्तक के अनुसार –

  • गाँधी जी एक विचित्र व्यक्ति थे जो छोटी-छोटी लड़कियों के साथ सोते थे।
  • स्वामी विवेकानंद ने लोगों को गोमांस भक्षण का सुझाव दिया।
  • लक्ष्मिबाई अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान थीं।
  • हिन्दुओं का कोई मूल ग्रन्थ नहीं है।
  • सीता लक्ष्मण पर आरोप लगाती हैं कि लक्ष्मण की उनके प्रति कामभावना है।

इसी प्रकार के अन्य भ्रामक एवं आधारहीन तथ्यों के आधार पर इस पुस्तक के द्वारा विश्व में हिन्दू धर्म के प्रति एक अत्यन्त गलत छवि निर्मित करने का कुत्सित प्रयास किया गया था। इसके विरूद्ध भारत और अमेरिका में आन्दोलन आरंभ किया गया। परिणाम स्वरूप अमेरिका में इस पुस्तक को राष्ट्रीय स्तर का पुरुस्कार दिया जाने वाला था वह रुक गया है। इसके विरुद्ध दिल्ली के साकेत न्यायालय मे जनहित याचिका दायर की गई। जिसके परिणामस्वरूप इस पुस्तक के प्रकाशक पैग्विंन प्रकाशन द्वारा न्यायालय के बाहर हुए समझौते में यह तय हुआ कि –

  • इस पुस्तक को नहीं बेचा जाएगा एवं इसकी जितनी प्रतियां बिकी हैं उन्हें वापस मंगाया जाएगा एवं
  • पैंग्विन प्रकाशन द्वारा वापस मंगा कर इनकी लुगदी बना कर नष्ट किया जाएगा।

यौन शिक्षा के स्थान पर चरित्रनिर्माण एवं व्यक्तित्व विकास की शिक्षा हेतु आन्दोलन

वर्ष 2007-08 में केन्द्र सरकार के द्वारा यौन शिक्षा लागू करने का प्रयास किया गया, उसके विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन चला। इस कारण से केन्द्र सरकार ने इस पर रोक लगाते हुए पाठ्यक्रम की समीक्षा हेतु एक समिति गठित की। हमारे द्वारा दायर की गई याचिका पर राज्यसभा की याचिका समिति ने देशभर में सुनवाई की। समिति ने अपनी रिपोर्ट दिनांक 2 अप्रैल 2009 को सभापति को प्रस्तुत की, जिसमें यौन शिक्षा के बदले “चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास की शिक्षा” देने को कहा।

संस्कृत भाषा के विरूद्ध षडयंत्र

विद्यालीन शिक्षकों हेतु ली जा रही ”शिक्षक पात्रता परीक्षा” मे से संस्कृत विषय को हटाने के विरूद्ध केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड(सी.बी.एस.ई) एवं हरियाणा शिक्षा बोर्ड के विरूद्ध क्रमश: दिल्ली एवं चंडीगढ़ में जनहित याचिका दायर की थी। जिसका निर्णय अपने पक्ष में आने से दोनों स्थानों पर इस परीक्षा में संस्कृत को सम्मिलित किया गया है।

केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत के स्थान पर जर्मन को गैरकानूनी रूप से पढ़ाए जाने के विरुद्ध आन्दोलन

वर्ष 2011 में केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा अपने समस्त विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र का उल्लंघन करते हुए संस्कृत भाषा के स्थान पर बालकों के जर्मन एवं अन्य विदेशी भाषाएं अनिवार्य रूप से पढ़ाई जा रही थीं। इस हेतु संस्कृत पढ़ाने हेतु नियुक्त शिक्षकों से जर्मन का अध्यापन कराया जा रहा था। केन्द्रीय विद्यालय संगठन का यह निर्णय पूर्ण रूप से गैरकानूनी एवं अनैतिक भी था। इसके विरुद्ध व्यापक आन्दोलन एवं न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने इस त्रुटि का सुधार किया एवं संस्कृत भाषा को विद्यालयों में उचित स्थान मिला।


संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के विरुद्ध षडयंत्र एवं सी0सैट के समावेश के विरुद्ध आन्दोलन

लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में 100 अंक का अंग्रेजी का प्रश्नपत्र अनिवार्य करके उसको मेरिट में जोड़ना तथा हिन्दी छोड़कर अन्य भारतीय भाषा में परीक्षा देने हेतु कम से कम 25 छात्र हों तथा उन छात्रों नें स्नातक स्तर पर उसी भाषा में परीक्षा दी होनी चाहिए। इस प्रकार अंग्रेजी की अनिवार्यता एवं अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय भाषाओं को इस परीक्षा में से दूर करने का षडयंत्र रचा गया था।

प्रारंभिक परीक्षा में सी0सैट0 का प्रश्नपत्र एवं अंग्रेजी के 22.5 अंक के अनिवार्य प्रश्न जो सभी भाषाओं के छात्रों को अनिवार्य रूप से करने थे, के द्वारा ग्रामीण एवं भारतीय भाषा माध्यम के विद्यार्थियों को सफलता से दूर करने का षडयंत्र किया गया था। इसके कारण इस परीक्षा में ग्रामीण एवं भारतीय भाषा पृष्ठभूमि के सफल छात्रों की संख्या वर्ष 2008 के बाद 53% से घटकर वर्ष 2014 में 12%से भी कम हो गई थी।

इस कुचक्र के विरुद्ध शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा विभिन्न मंचो एवं न्यायालय में आवाज उठाया गया एवं व्यापक जनांदोलन के द्वारा एवं अन्य संस्थाओं के सहयोग से अपेक्षित परिणाम प्राप्त हुए। केन्द्र सरकार के द्वारा इस परीक्षा के संबन्ध में नए निर्णय के अनुसार –

  • सी0सैट0 की परीक्षा अब मात्र अर्हताकारी होगी एवं इसके अंक मेरिट में नहीं जुड़ेंगे।
  • अंग्रेजी के 22.5 अंको के प्रश्न अनिवार्य नहीं होंगे।
  • मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी के अनिवार्य प्रश्नपत्र हेतु अत्तीर्णांक 25% होगा।


संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) शिक्षा में नए विकल्प का प्रयास

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के माध्यम से देश की शिक्षा में एक नए विकल्प देने हेतु प्रयास शुरु किए गए हैं। इस दृष्टि से देश की शिक्षा हमारी संस्कृति, प्रकृति एवं प्रगति के अनुरूप बने तथा हमारे छात्रों के चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास के द्वारा देश का समुचित विकास हो सके। इस प्रकार शिक्षा का स्वरूप बने। यही हमारा प्रयास है।

इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु वर्तमान में छ: विषयों पर कार्य किया जा रहा है-

  • चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के विकास की शिक्षा।
  • वैदिक गणित
  • मूल्यपरक शिक्षा
  • पर्यावरण शिक्षा
  • भारतीय भाषा(मातृभाषा) में शिक्षा
  • शिक्षा की स्वायत्ता

उपरोक्त विषयों पर विभिन्न राज्यों एवं राष्ट्रीय स्तर पर परिसंवाद(सेमिनार), कार्यशालायें, परिचर्चाएं एवं गोष्ठियों के आयोजन किये जा रहे हैं। इन विषयों पर पाठ्यक्रम, संदर्भ(रेफरेंस) पुस्तकें, प्रशिक्षण हेतु साहित्य तैयार किया जा रहा है। उपनिर्दिष्ट विषयों के संदर्भ में जो प्रयास किए जा रहे हैं वे निम्न लिखित हैं-


मूल्यपरक शिक्षा

“जब से देश की शिक्षा से जीवन मूल्यों का विछोह हो गया तब से देश की जनता धर्म एवं पथ भ्रष्ट हो गई”- महर्षि अरविन्द
स्वतंत्र भारत के शिक्षा के सभी आयोगों ने मूल्यपरक शिक्षा कीअनुशंसा की है। देश के महापुरुषों एवं संत महात्माओं नें भी इसी दिशा में मार्गदर्शन दिया। परंतु देश की शिक्षा में आज तक मूल्यों का समावेश नहीं किया गया।

न्यास के द्वारा उच्च शिक्षा के विभिन्न संकायों के अनुसार इसके पाठ्यक्रम बनाने चाहिए ऐसा विचार रखा है। इस हेतु कुछ संस्थानों के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित करके क्रियान्वित करने की दिशा में कार्य प्रारंभ किया गया है।

    • तकनीकि शिक्षा में मूल्यों के समावेश हेतु पंजाब तकनीकी विश्वविद्यालय एवं उज्जैन इंजीनियरिंग महाविद्यालय (म.प्र.) एवं हजारीबाग(झारखंड) में परिसंवादों का आयोजन किया गया। एवं अखिल भारतीय स्तर पर इसी प्रकार के अनेक सम्मेलन आयोजित किए गए एवं मूल्य शिक्षा हेतु वातावरण का निर्माण किया गया।
    • प्रबंध शिक्षा में जीवनमूल्यों के समावेश हेतु महाराजा अग्रसेन वि0वि0 हिमाचल प्रदेश एवं पेसिफिक वि0वि0 उदयपुर में इस हेतु नई पाठ्यचर्या एवं कार्यक्रम हेतु वृहद् स्तर पर कार्य किया जा रहा है। इस दिशा में विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय सम्मेलनों एवं कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।
    • संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश तथा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता वि0वि के साथ मिलकर भोपाल में अप्रैल 2015 में “मूल्याधारित जीवन” पर एक तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 1700 से अधिक प्रतिभागियों एवं 125 से अधिक विशेषज्ञों का योगदान रहा। इस सम्मेलन में मूल्याधारित जीवन के निम्नलिखित प्रकल्पों पर विचार हुआ।
      • मूल्याधारित प्रारंभिक शिक्षा
      • मूल्याधारित उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा
      • जनसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में मूल्यनिष्ठता
      • शासन प्रशासन में मूल्योन्मुखता
      • चिकित्सा सेवाओं में मूल्यपरकता
      • व्यावसायिक जीवन में मूल्योन्मुखता
      • पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्यनिष्ठता
      • मूल्यों की सार्वभौमिकता
      • न्याय एवं विधि क्षेत्र में मूल्योन्मुखता


    चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास की शिक्षा

    वर्तमान में देश मे दिखाई दे रही समस्याओं की जड़ चरित्र का संकट(क्राइसिस ऑफ कैरेक्टर) है। व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास से ही चरित्रवान नागरिकों का निर्माण हो सकता है। इस हेतु न्यास के द्वारा पाठ्यक्रम एवं पुस्तके तैयार की गई है। विगत वर्षों में पूरे देश में इस विषय पर 100 से भी अधिक कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है। इस विषय के प्रयोगों के परिणामस्वरूप आश्चर्यजनक सुधार हुए हैं जिनमें बिना शिक्षक परीक्षा लेने एवं छात्रों द्वारा इसी प्रकार के उच्चतम नैतिकता के प्रदर्शन के प्रयोग हैं। वर्तमान में इस प्रकार के प्रयोग विभिन्न राज्यों के 200 से भी अधिक विद्यालयों में चल रहे हैं।

    अटल बिहारी बाजपेई हिन्दी वि0वि0 भोपाल के साथ मिलकर एक छः मास का प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम निर्मित किया गया है।


    वैदिक गणित

    आज समग्र विश्व में अधिकतर छात्र गणित से भयभीत हैं। इससे छात्रों को मुक्त कराने की क्षमता वैदिक गणित में हा। इस वर्ष न्यास के द्वारा देश के 11 राज्यों में 50 से अधिक कार्यशालाओं में हजारों विद्यार्थी सहभागी हुए हैं। इस दिशा में ठोस कदम हेतु प्रयास किये जा रहे हैं-

    • विश्व विद्यालयों हेतु प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम(सर्टिफिकेट कोर्स) तैयार किया गया है। दो विश्वविद्यालयों ने अनुबंध (MOU) किया है।

    1 कालीदास संस्कृत विश्वविद्यालय-नागपुर।

    2 अटलबिहारी वाजपेई हिन्दी विश्वविद्यालय- भोपाल।

    • कक्षा 1 से 12 तक का वैकल्पिक पाठ्यक्रम तैयार किया गया है।
    • प्रतियोगी परीक्षा हेतु पाठ्यक्रम का कार्य शुरु किया गया है।
    • उज्जैन में वैदिक गणित शोध संस्थान प्रारंभ ककरने की योजना बनाई गई है।


    पर्यावरण की शिक्षा

    सर्वोच्च न्यायालय के 18.12.2003 के निर्णय के कारण पर्यावरण अनिवार्य विषय बना है, परंतु देश में इस दिशा में परिणामकारक प्रयास का आभाव दिखाई दे रहा है। इस हेतु-

    • कक्षा 1 से 12 तक का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है इसको पूर्णता देने हेतु देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में 20 से अधिक कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।
    • तकनीकि शिक्षा मे पर्यावरण के पाठ्यक्रम का कार्य पंजाब तकनीकि विश्वविद्यालय के द्वारा किया जा रहा है।
    • पर्यावरण के पत्रक हजारों की संख्या में छापकरक गोष्ठियों एवं कार्यशालाओं के माध्यम से जन-जागरण का कार्य भी किया जा रहा है।


    भारतीय भाषा

    विश्व के भाषा के वैज्ञानिकों, शिक्षा के आयोगों एवं विद्वानों, महापुरुषों आदि का मानना है कि शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। परंतु हमारे देश में लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप छात्रों एवं देश के विकास में रुकावट निर्मित हो रही है। न्यास का मानना है कि जब तक देश का शासन प्रशासन , उच्च शिक्षा एवं प्रतियोगी परीक्षाएं भारतीय भाषाओं में नहीं होंगी तब तक अपनी भाषाओं का विकास असंभव है। इस हेतु-

    • जनजागरण हेतु राष्ट्रीय, राज्यस्तरीय एवं स्थानीय स्तर पर गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है।
    • विधि शिक्षा एवं न्याय व्यवस्था में भारतीय भाषा पर जबलपुर, इंदौर, अहमदाबाद एवं दिल्ली के साकेत न्यायालय में गोष्ठियाँ आयोजित करके एक घोषणा पत्र तैयार किया गया है। जिस पर देश भर में चर्चा की जा रही है
    • दिनांक 10,11 अगस्त 2013 को दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन आयोजित किया गया।
    • केन्द्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा भाषा के कानून के विरुद्ध किए जा रहे कार्य के संदर्भ में 2000 से अधिक पत्र लिखे गए हैं। जिसमें कई विषयों में सफलता भी मिली है।
    • फरवरी 2015 में भोपाल में एवं अप्रैल 2015 में कानपुर में भारतीय भाषा पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें भारतीय भाषाओं के प्रयोग एवं स्थिति की समीक्षा की गई एवं आगे की कार्ययोजना तैयार हुई। इस सम्मेलन में निम्नलिखित क्षेत्रों में भारतीय भाषा की स्थिति पर चर्चा हुई।
      • शिक्षा में भारतीय भाषा की स्थिति
      • जनसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में भारतीय भाषाएं
      • वित्तीय क्षेत्र में भारतीय भाषाएं
      • प्रशासनिक कार्यों में भारतीय भाषाएं
    • इस दिशा में कार्य करने वाले विद्वानों एवं संस्थाओं को एक मंच पर लाने हेतु भारतीय भाषा समन्वय मंच का गठन किया गया है।


    शिक्षा की स्वायत्ता

    जब तक शिक्षा स्वायत्त, स्वतंत्र नहीं होगी तब तक शिक्षा का सही दिशा ने विकास संभव नहीं होगा। स्वतंत्र भारत में यह बात सामान्य है कि सरकार बदलने से शिक्षा पाठ्यक्रम, व्यवस्था, अधिकारी आदि में बदलाव हो जाता है। परंतु आभि तो एक ही सरकार में मंत्री बदलने से यह सारी बातें बदल जाती हैं। शिक्षा शासन-प्रशासन व राजनीति से पूर्णत: मुक्त होनी चाहिए। इस हेतु राष्ट्रीय से लेकर जिला स्तर तक “स्वायत्त शिक्षा संस्थान” का गठन किया जाना चाहिए। सरकारे, शिक्षा सुचारू रूप से संचालित हो इस हेतु हर प्रकार से सहयोग करे। लेकिन हस्तक्षेप न करे।

    इस हेतु न्यास के द्वारा एक प्ररूप बनाकर देश व्यापी बहस प्रारंभ की है। इंदौर, बीकानेर(राजस्थान) एवं अलीगढ़ में गोष्ठियों का भी आयोजन किया गया है तथा विद्वानों के लेख आमंत्रित कर स्मारिका प्रकाशित की गई है। दिनांक 19-20 अक्टूबर 2013 से मथुरा में राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया ।


    शिक्षा उत्थान पत्रिका

    इन सारे विषयों को समाज तक पहुँचाने तथा शैक्षिक जागरुकता के लिए द्विमासिक पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित की जा रही है।