भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

शिक्षा में नये विकल्प हेतु प्रयास

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा शिक्षा में नये विकल्प हेतु प्रयास

 

श्री अतुल कोठारी

(सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास)

सरस्वती बाल मन्दिर, जी ब्लाक नारायणा विहार

नई दिल्ली-110028

सम्पर्क सूत्र:-9212385844, 9868100445

 

देश की स्वतन्त्रता के 62 वर्षो के बाद आज भी देश में चर्चा जारी है कि देश की शिक्षा कैसी हो? स्वतंत्र भारत में सरकार के द्वारा कई आयोग, समितियाँ गठित की गई, उन्होंने अच्छे सझाव भी दिये। लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में इन सुझावों को क्रियान्वयन नहीं किया गया।

आज सकारात्मक परिवर्तन की बात तो दूर लेकिन विभिन्न स्तर के शिक्षा के पाठ्यक्रमों में भयानक विकृतियाँ एवं विसंगतियाँ भरी पड़ी है। पाठ्यक्रम में व्याप्त विकृतियाँ एवं विसंगतियों के विरूद्ध शिक्षा बचाओ आन्दोलन ने विगत 6 वर्षों में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों के द्वारा उसमें सुधार कराने में सफलता प्राप्त की है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है।

इसलिए शिक्षा में समग्र परिवर्तन हेतु शिक्षा बचाओ आन्दोलन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के माध्यम से निम्नलिखित प्रयास किए जा रहे है।

 

    • शिक्षा में विकृतियाँ, विसंगतियाँ को सुधार करने का प्रयास।
    • शिक्षा में नये विकल्प की तैयारी।

 

देश की शिक्षा के पाठ्यक्रमों में विकृतियाँ, विसंगतियाँ यह कोई नया विषय नहीं है। जब से अंग्रेजो के राज में मैकाले द्वारा जो शिक्षा व्यवस्था में बदल करके देश की शिक्षा को अभारतीय अर्थात

यहां की धर्म, संस्कृति, महापुरूषों एवं देवी-देवताओं को अपमानित करके भारत की छवि को धुमिल करके विश्व में स्थापित किया है उसी दिशा में आज भी राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक षडयंत्र के तहत प्रयास किए जा रहे हैं।

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए.भाग-2(आनर्स) की इतिहास की पुस्तक में‘‘थ्री हन्ड्रेड रामायण विद फाईव एक्जाम्पल’’ को पाठ्यक्रम में सम्मिलत किया गया था। जिसमें माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। लेख के पीछे षंडयंत्र यह है कि जब वर्ष 1991-92 में रामायण सीरियल देश में काफी प्रचलित हुई थी। उस समय इग्लैण्ड के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली महिला पौला रीचमैन को कष्ट हो गया। इसके बाद पौला रीचमैन और रोमिला थापर मिले और चर्चा करते है कि एक ही रामयाण (वाल्मीकी रामायण) इतनी प्रचलित होगी तब बाकी रामायणों का क्या होगा? यह सोच कर उन्होंने ‘‘मैनी रामायणा’’ किताब लिखी जिसमें एक लेख ‘‘थ्री हण्ड्रेड रामायणा विद फाईव एक्जाम्पल’’ सम्मिलित है। इसी प्रकार ‘‘वेन्डी डोनिगर’’ (शिकागों विश्वविद्यालय अमेरिका) ने ‘‘द हिन्दूज-एन आल्टरनेटिव हिस्ट्री’’ किताब में भयानक विकृत सामग्री लिखी है।

 

जिसके विरूद्ध न्यास के द्वारा भारत एवं अमेरिका में आन्दोलन शुरू किया गया है। इसके परिणामस्वरुप अमेरिका में वेण्डी डोनिगर को दिये जाने वाले राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार को रोका गया है। इसी प्रकार शिक्षा बचाओ आन्दोलन के द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की इतिहास की पुस्तकों के विरूद्ध में साढ़े तीन वर्ष चले आन्दोलन के बाद दिनांक 31 जनवरी 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 75 विकृत पैरे हटाने का आदेश दिया। लेकिन इसके बाद आयी नई पुस्तकों में कक्षा 8 वी में सच्चर कमेटी को पढ़ाया जा रहा है। तुलसीदास के जन्मस्थान के सन्दर्भ में विवादास्पद उल्लेख आदि विकृत सामग्री डाली गई है।

 

हम सब जानते है और वह बात पुनः प्रस्थापित भी हो रही है कि भारत एक महान राष्ट्र था, यहां की परम्परा, व्यवस्था, संस्कृति आदि श्रेष्ठ थे। इस दिशा में उभरते भारत को गलत चित्रित करने के जो प्रयास राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे है। उसको बेनकाब एवं परास्त करने हेतु शिक्षा बचाओ आन्दोलन सफलतापूर्वक प्रयासरत है।

 

शिक्षा में नये विकल्प हेतु प्रयासः-

यूनेस्को की डेलर्स समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि किसी भी देश की शिक्षा उस देश की संस्कृति एवं प्रगति के अनुरूप होनी चाहिए। क्या आज देश की शिक्षा अपनी संस्कृति, प्रगति के अनुरूप है? उत्तर स्वाभाविक नकारात्मक आता है। शिक्षा से तात्पर्य है कि जिससे विद्यार्थी के व्यक्तित्व का समग्र विकास तथा चरित्र निर्माण हो एवं राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति एवं चुनौतियों का समाधान हो। शिक्षा की हमारी मूलभूत संकल्पना यह शाश्वत सत्य है। इस को आधार बनाकर आधुनिकता की आवश्यकताएं एवं भविष्य की दृष्टि को ध्यान मे रखकर भौतिकता एवं आध्यात्मिकता तथा व्यवहार एवं सिद्वांत का समन्वय करते हएु शिक्षा मूल्य आधारित हो, मातृभाषा में हो तथा शिक्षा स्वायत्त हो। इस दिशा में शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन का यह कार्य देशव्यापी करने की आवश्यकता है। इस दिशा में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा जो प्रयास किए जा रहे है। वह इस प्रकार हैः-

2007 में देश में यौन शिक्षा लागु करने का प्रयास केद्र सरकार के द्वारा किया गया था। इसके विरूद्ध देशव्यापी आन्दोलन चला, इस प्रयास में देश की अनेक संस्थाए जुड़ी। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने अपना निर्णय स्थगित किया। उस पाठ्यक्रम की समीक्षा हेतु कुछ राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार के द्वारा समितियाँ गठित की गई। जब आन्दोलन चल रहा था उसी समय अपने माध्यम से राज्यसभा की याचिका (पेटिशन) समिति को एक याचिका दी गई थी। समिति ने याचिका को स्वीकार करते हुए उस पर देश के सात बड़े महानगरों में सुनवाई की जिसमें उनको 40 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। इन आवेदनों की जब समीक्षा की गई तब अधिकतर आवेदन यौन शिक्षा के विरूद्ध में थे। याचिका समिति ने लगभग डेढ़ वर्ष कार्य करते हुए अपना रिपार्ट तैयार किया। जिस रिपोर्ट पर देश के उपराष्ट्रपति ने भी हस्ताक्षर किए। बाद में उस रिपोर्ट को राज्यसभा में भी रखा गया। याचिका समिति में सम्मिलत कई पक्षों के सांसदों ने सर्वसम्मति से पारित रिपोर्ट में कहा की यौन शिक्षा के बदले ‘‘चरित्र निमार्ण एवं व्यक्तित्व विकास की शिक्षा’’ देनी चाहिए। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने भी यौन शिक्षा का विकल्प देने हेतु सोचा और दिनांक 21, 22 फरवरी 2009 को पूणे में राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद आयोजित किया। इस परिसंवाद में देशभर से आए विद्धानों ने सर्वसम्मति से एक प्रारूप तैयार किया तथा पाठ्यक्रम समिति का गठन भी किया। पाठ्यक्रम समिति ने चार मास कार्य करके ‘‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास’’ का पाठ्यक्रम तैयार किया। उस पाठ्यक्रम पर चर्चा हेतु देश में सात परिसंवादों का आयोजन किया गया। इन परिसंवादों में छात्र, शिक्षक, अभिभावक, शिक्षाविद् विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं के 1200 से अधिक प्रतिनिधि सहभागी हुए। परिसंवाद में आने वाले प्रतिभागीयों को पाठ्यक्रम की पुस्तक पढ़कर, सुझाव लेकर आना अपेक्षित था। सातों परिसंवादों के सुझाव पर विचार हेतु पुनः पाठ्यक्रम समिति की बैठक हुई। उसके बाद नये स्वरूप में पाठ्यक्रम तैयार किया गया। जिसका शीषर्क दिया है ‘‘विद्यालय गतिविधियों का आलय’’ यह पाठ्यक्रम शिक्षकों के लिये होगा। छात्रों हेतु इस पाठ्यक्रम के आधार पर एक कार्यक्रम तैयार किया है। वर्तमान विद्यालय की व्यवस्था में ही इस कार्यक्रम को सम्मिलित करना है। इस हेतु कोई अलग से पुस्तक या कालांश नहीं रहेगा। इस कार्यक्रम को प्रायोगिक तौर पर 50 विद्यालयों में लागू करने के लिये दिनांक 16 सें 18 अप्रैल उन विद्यालयों के प्रधानाचार्यो की एक कार्यशाला सम्पन्न की गई। आगामी दिनों में अन्य विद्यालयों तक इस कार्यक्रम को ले जाने की योजना है। दूसरी ओर पंजाब, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों ने यौन शिक्षा के बदले योग शिक्षा लागु करने का निर्णय किया है। उतर प्रदेश सरकार ने यौन शिक्षा के बदले स्वास्थ्य की शिक्षा की घोषणा की है। योग, स्वास्थ्य यह विषय भी अपने नये पाठ्यक्रम का हिस्सा है।

 

आगामी दिनों में उपरोक्त प्रयास की दिशा में अन्य पांच विषयों पर कार्य की योजना भी बनी है।

  1. मूल्य परक शिक्षा
  2. वैदिक गणित
  3. पर्यावरण की शिक्षा
  4. मातृभाषा में शिक्षा
  5. शिक्षा स्वायत्त हो।

 

इन विषयों पर किये जा रहे कार्य की जानकारी निम्नलिखित हैः-

 

मूल्यपरक शिक्षा:-

स्वतंत्र भारत में शिक्षा सम्बन्धित सरकार के द्वारा जितने भी आयोग, समितियाँ बनी उन सबने मूल्य शिक्षा की वकालत की है। लेकिन आज तक देश की शिक्षा में मूल्यों का समावेश नहीं हुआ। दूसरी तरफ यह भी सत्य है कि इस विषय पर समाज में लगभग आम सहमती हैं कुछ निजी संस्थाए अपने-अपने विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा, नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा, जीवन विद्या, मानव मूल्य एवं जीवन मूल्य आदि नामों से इस विषय को पढ़ाया जा रहा है। शीर्षक अलग-अलग है लेकिन साधारण विषय वस्तु में बहुत अन्तर नहीं है। इन सारी संस्थाओं को एक मंच पर लाने का प्रयास आवश्यक है। इस हेतु अपने द्वारा हरिद्वार, अमदाबाद, ग्वालियर में परिसंवादों का आयोजन किया गया। इस विषय पर समग्रता से पाठ्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता है। विद्यालयीन शिक्षा के लिए अपने द्वारा ‘‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास का पाठ्यक्रम तैयार हो चुका है। उच्च शिक्षा हेतु एक समिति का गठन किया जा रहा है। आगामी दिनों में इस हेतु राष्ट्रीय स्तर की एक बैठक का आयोजन किया जाएगा। जिसमें उच्च शिक्षा के विभिन्न संकायों में मूल्यों का समावेश पर चर्चा-चिन्तन होगा। इसके बाद आगे की योजना पर कार्य होगा।

 

पर्यावरण शिक्षा –

आज ‘ग्लोबल वार्मिग’’ जिस को कहा जा रहा है। इन सारी समस्याओं का समाधान भारतीय चिन्तन में है। हमारे सारे प्राचीन, धर्म ग्रन्थों में पर्यावरण का उल्लेख है। देश में उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार विद्यालयों में पर्यावरण का पाठ्यक्रम जोड़ा गया है, लेकिन उसकी ठीक प्रकार से योजना, व्यवस्था, पाठ्यक्रम नहीं है। इस हेतु भारतीय चिन्तन के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार हो यह आवश्यक है। इसके चिन्तन के लिए दिनांक 28, 29 अगस्त 2010 को दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की एक बैठक का आयोजन किया है।

 

वैदिक गणित:-

वैदिक गणित विषय पर विगत अगस्त माह से कार्य की शुरूआत की गई है। इस हेतु एक विद्वानों की टोली का गठन किया है जिसकी चार बैठकें सम्पन्न हुई है। इन चारों बैठकों के निष्कर्ष के रूप में विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं के साथ जुड़कर देश में राष्ट्रीय स्तर के पांच परिसंवाद (सेमीनार) आयोजित करने का निर्णय किया था। जिसका वृत्त प्रस्तुत है।

 

क्र . सं स्थान दिनांक सहभागी प्रान्त संख्या सहयोगी संस्था अतिथि
नागपुर ३०, ३१ जनवरी १२२

हिस्लोप कॉलेज, नागपुर वि.वि. वैदिक गणित टीचर एसोसिएशन,

कनिष्ठ महाविद्यालय गणित शिक्षक क. परिषद्

डॉ. दीप्ती क्रिश्चयन, प्राचार्य हिसलोप कॉलेज, नागपुर
जयपुर १३, १४ फरवरी १५५ जे.ई.सी.आर. सी फाउण्डेशन जयपुर डॉ. दामोदर जी (पूर्व कुलपति तकनीकी वि.वि.कोटा)
बिलासपुर २५, २६ फरवरी ८६ डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय बिलासपुर

श्री वृजमोहन अग्रवाल,शिक्षा मंत्री,

श्री रमेश चन्द्र शर्मा,(आई.जी.)

हैदराबाद २०, २१ मार्च १२५

केशव मेमोरियल इन्स. आफ टेक्नोलॉजी,चैतन्य भारती, हैदराबाद

इंस्टिट्यूट ऑफ़ रिसर्च आन वेदाज हैदराबाद

कुप्पा वैकटा कृष्णमूर्ति, चैयरमेन (आई सर्वे),

प्रो. वी. केनन(कुलपति,केन्द्रीय वि.वि.)

वाराणासी २०, २१ मार्च ५५

ज्योतिष विभाग, वेद विभाग, काशी हिन्दू वि.वि.

तथा विज्ञान भारती

श्री नरेन्द्र पुरी, (आई.आई.टी रूडकी)

प्रो.श्री बी.डी. सिंह (रेक्टर काशी हिन्दू वि.वि.)

राठ (उ.प्र.) ६, ७ फरवरी स्थानीय ३५०

बी. एन. पी. कॉलेज राठ,

मित्तल इन्टरप्राईजेज, दिल्ली,

नूपूर इन्टरप्राईजेज बान्दा

डॉ. के. बी. वर्मा प्राचार्य, बी. एन. पी. कॉलेज राठ(उ.प्र.)

 

आगामी योजना के अन्तर्गत भोपाल में एक ‘‘वैदिक गणित शोध संस्थान’’ स्थापित करने की योजना हैं। उस संस्थान के द्वारा चार प्रकार के कार्य करने की योजना है।

  • कक्षा 1 से 12 तक का समग्रता से पाठ्यक्रम तैयार करना।
  • उच्च शिक्षा में वैदिक गणित का समावेश।
  • संगणक एवं वैदिक गणित।
  • प्रतियोगी परिक्षा में वैदिक गणित का उपयोग।

आगामी वर्ष में इन चारों विषयों के अनुसार राष्ट्रीय स्तर के परिसंवाद की योजना है। इसी प्रकार राज्य स्तर पर भी कार्यशाला, परिसंवादों का आयोजन किया जा रहा है।

 

मातृभाषा में शिक्षा:-

विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां प्राथमिक शिक्षा विदेशी भाषा में पढ़ाई जा रही हो। विज्ञान एवं तर्क के आधार पर तो यह बात सर्वमान्य है कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। देश से अंग्रेज गए अंग्रेजीयत नहीं गई इस बात का यह प्रमाण है कि सामान्य व्यक्ति से लेकर अधिकतर विद्वान लोगों में यह भ्रम इतना दृढ़ है की बिना अंग्रेजी देश का एवं व्यक्ति का विकास सम्भव नहीं है, इस परिस्थिति में भाषा की लड़ाई बहुत व्यापक स्तर पर लडनी होगी। देश की समग्र शिक्षा को बदलने के लिए जितना प्रयास करना पड़ेगा उससे भी अधिक प्रयास अपनी भाषाओं की पुनः स्थापना हेतु करना पड़ेगा। इस विषय सम्बन्ध में सम्पर्क कार्य जारी है। व्यक्तिगत जीवन में अपनी भाषा के प्रयोग हो इस हेतु प्रयास शुरू किए है जैसे:-

  1. हस्ताक्षर अपनी भाषा में करना।
  2. अंग्रेजी मे भी बोलना पड़े या लिखना पड़े तो भी इन्डिया नहीं भारत का ही प्रयोग करे।
  3. अपने सारे कार्यक्रम अपनी ही भाषाओं में संचालित किये जाए।
  4. मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा’’ नामक 5,50,000 पुस्तकों का वितरण किया गया है। आगे देश की विभिन्न भाषाओं में इस पुस्तक को प्रकाशित करने की योजना है।
  5. राष्ट्रीय स्तर पर एक टोली बनाने की प्रक्रिया जारी है। आगामी दिनों में इसकी बैठक भी होगी।

 

शिक्षा में स्वायत्तता:-

इस कार्य हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्वायत्त शिक्षा संस्थान की स्थापना होनी चाहिए। यह संस्थान पूर्ण रुप से स्वयत्त हो। जैसे न्यायालय या चुनाव आयोग की सारी व्यवस्था सरकार करती है। लेकिन वही न्यायालयों ने अनेक निर्णय सरकार के विरूद्ध दिये है। हमारा मानना है कि चुनाव आयोग एवं न्यायालय से भी अधिक स्वायत्तता शिक्षा को देनी चाहिए। स्वायत्त शिक्षा संस्थान का गठन राष्ट्रीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक होना चाहिए। इसका एक प्रारूप बनाकर देशव्यापी चर्चा का प्रयास शुरू किया है।

 

इसी प्रकार आगामी दिनों में शिक्षा के प्रत्येक विषय में अपने शाश्वत सिद्वांतो को आधार बनाकर आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार एक नई व्यवस्था देने के प्रयास की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है।

 

जनजागरण के प्रयास:-

परिचर्चा, परिसंवाद, गोष्ठियों का आयोजन:-

शिक्षा के विभिन्न विषयों पर इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन सातत्य से किए जा रहे है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से देश के नागरिकों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास जारी है। इससे समाज में यह प्रस्थापित होना है कि शिक्षा मात्र सरकार या कुछ संस्थाओं का विषय नहीं है। यह वषिय सम्पूर्ण समाज का है। साथ ही शिक्षा से सीधे जुड़े सभी प्रकार के लोगों का शिक्षा में नये विकल्प की चर्चा-चिन्तन में सहभागी होने से वास्तविक रूप में देश की जनता क्या चाहती है यह भी समाज, सरकार के समक्ष उभकर इसी प्रकार आगामी दिनों में शिक्षा के प्रत्येक विषय में अपने शाश्वत सिद्वांतों को आधार बनाकर आधुनिक आवश्यकता के अनुसार एक नई व्यवस्था देने का प्रयास की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है। अन्यथा पिछले 1500-2000 वर्षो से अपने देश में चिन्तन प्रक्रियाा रूक गई है। इस चिन्तन प्रकिया को पुनः शुरू करने का भी प्रयास है। अन्यथा जैसे यौन शिक्षा का पाठ्यक्रम युनीसेफ के द्वारा आया वह यथावत लागु कर दिया गया। विभिन्न प्रकार के प्रबन्धन के पाठ्यक्रम विदेशों से आ रहे है वह भी यथावत लागु किये जा रहे है। वास्तव में चिंतन की आवश्यकता है कि अपने देश में किस प्रकार का प्रबन्धन का पाठ्यक्रम आवश्यक है। विदेश की कुछ अच्छी बाते है उसको अवश्य जोड़ सकते है लेकिन अन्धानुकरण बन्द होना चाहिए।

 

साहित्य प्रकाशन:-

शिक्षा सम्बन्धित विषयों पर लाखों की संख्या में विभिन्न भाषाओं में पत्रक छपवाकर समाज तक पहुँचाने का प्रयास हो रहा है। साथ ही अभी तक अपने द्वारा 50 पुस्तकें प्रकाशित की गई है। जो 6000 विद्वानों को नियमित भेजी जा रही है आगामी दिनों में इसको आगे बढ़ाने की योजना है। इसके अतिरिक्त भी शिक्षा सम्बन्धित पुस्तकों का प्रकाशन किया जा रहा है।

 

उपरोक्त सारे प्रयासों को योग्य दिशा में आगे बढ़ाने और शिक्षा पर समाजव्यापी जागरण हो इस हेतु निम्नलिखित बाते भी अति आवश्यक है।

  1. शिक्षा शास्त्री, शिक्षाविदों का व्यापक सम्पर्क अभियान चलाते हुए विषय के अनुसार उनकी सूची तैयार करना।
  2. विभिन्न विषयों के शोध केन्द्र स्थापित हो जिसमें उन विषय के अपने शाश्वत सिद्धान्त के आधार पर आधुनिक आवश्यकता के अनुसार नये पाठ्यक्रम पाठ्य-पुस्तकें तैयार करना।

कुछ शोध केन्द्र हम स्थापित कर सकते है लेकिन अन्य सामाजिक शैक्षिक संस्थाए इस प्रकार के केन्द्र स्थापित करे इसका भी प्रयास करना। प्रत्येक राज्य में कम से कम एक विषय पर शोध कार्य शुरू हो जिसमें कार्य अखिल भारतीय स्तर का हो।

  1. अपने द्वारा विषयों के अनुसार एक विद्वानों की टोली का गठन करना।
  2. शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षिक संस्थाओं से सम्बन्ध स्थापित करना। अपने द्वारा हो रहे कार्यक्रमों का आयोजन ऐसी विभिन्न संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में किए जा रहे है। इस प्रकार की संस्थाओं का एक अखिल भारतीय या प्रांतीय स्तर पर सम्मेलन आयोजित करना चाहिए इस प्रकार की अपेक्षा की जा रही है।
  3. देश के प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों में शिक्षा के चिन्तन की प्रकिया शुरू हो। अन्यथा आज बहुत कम संस्थाओं में यह प्रयास किये जा रहे है।
  4. शिक्षा के विभिन्न विषयों पर कार्यरत राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की अनेक ऐसोशिएशन तथा संस्थाएं है उसके साथ सम्पर्क, सम्बन्ध बढ़ाना। इन संस्थाओं में भी भारतीय चिन्तन के आधार पर शिक्षा के उन विषयों का चिन्तन और कार्य शुरू हो यह आवश्यक है।
  5. राज्यों एवं केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्री, सचिव तथा अन्य अधिकारियों से हमारे नियमित सम्पर्क बने। वहां चल रहे विषयों की आवश्यक जानकारी प्राप्त हो सके, वहां की निर्णय प्रक्रिया पर भी हम प्रभाव डाल सकें। इसका भी प्रयास आवश्यक है। इसी प्रकार शिक्षा के राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों के केन्द्रों में भी सम्पर्क स्थापित करना।
  6. विभिन्न राजनैतिक पक्षों के पदाधिकारी एवं सांसदो, विधायको से भी सम्पर्क आवश्यक है। धीरे-धीरे पक्ष की रेख से पर शिक्षा के हित में सर्वसम्मति बने इस दिशा में प्रयास करना।
  7. हम शिक्षा में नया विकल्प दे सके इस हेतु शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत सभी संगठनों संस्थाओं ने मिलकर एक योजना तैयार करना। इस दिशा में सामूहिक एवं संगठन सह प्रयास की भी योजना बने। जिससे आगे के पाचं वर्षो में कुछ ठोस परिवर्तन दिखाने की स्थिति में हम आ सके।